बहुत हो गया, अब खत्म हो मौताणा
DBUDA5166 | 1/10/2011 | Author : bhaskar correspondentnt
उदयपुर। शुरुआती दौर में अपराधी को भविष्य में अपराध करने से रोकने और गलती का अहसास कराने के लिए चली मौताणा प्रथा आज हिंसक हो चली है। मौत या शारीरिक क्षति के लिए अब हर्जाना नाकाफी हो चला है। अब हिंसा के बदले हिंसा की बढ़ती प्रतिक्रिया ने खुद आदिवासियों को भी हिलाकर रख दिया है। अब मौताणा ने जान के बदले जान लेने, घरों को तहस नहस कर देने का हिंसक रूप लेकर ऐसे मर्ज की शक्ल ले ली है, जो संबंधित पक्ष के पीछे रहने वालों को भी जीते जी मार देता है।
कई बार तो प्राकृतिक मौत पर भी मौताणा वसूला जाता है। यह बुराई जंगलों से निकल कर संभाग मुख्यालय तक पहुंचने लग गई है।कुछ इस तरह का माहौल था रविवार को यहां राजस्थान आदिवासी अधिकारी मंच द्वारा आयोजित संवाद में। मौताणा जैसी कुप्रथा से पीड़ित और भुगतभोगी लोगों, संभाग भर के आदिवासी मुखियाओं, पटेलों, मोतबीरों और बुद्धिजीवियों ने एक स्वर से मौताणा की बुराई को त्यागने का आह्वान किया।
पूरे परिवार को गांव छोड़ना पड़ा था
कोटड़ा के वियोल गांव से आई कदनी बाई ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि इस कुरीति के कारण उसकेपरिवार पर हत्या का झूठा लांछन लगा और खानदान के 16 घरों के सदस्यों को गांव से विस्थापित होना पड़ा। इस कारण उसके सभी सदस्य विस्थापन की पीड़ा के साथ साथ गरीबी, बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। पिछले दो साल से उनके बच्चों की पढ़ाई चौपट हो रही है। कोटड़ा के आदिवासी मुखी पाबु पटेल और डूंगरपुर के वीरजी, सिरोही के विसाराम, बांसवाड़ा के थावरा भाई और खेरवाड़ा की साधना मीणा आदि ने अप्राकृतिक मौतों पर भी मौताणा वसूलने के इस चलन को समाज के लिए घातक बताया।
‘समाज ही कर सकता है इस बुराई का खात्मा’...
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